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पता नहीं ऐसा क्या था

मैं बचपन से ही ज़्यादातर समय
माँ‑पापा के पास नहीं,
अपने नाना जी के पास रहा।
पता नहीं ऐसा क्या था उनमें,
कि वो ही मुझे सबसे ज़्यादा अपने लगे।
कभी‑कभी सोचता हूँ—
क्या हमारे बीच सिर्फ़ इस जन्म का रिश्ता था,
या कोई बहुत पुराना,
शायद पौराणिक सा संबंध था,
जो शब्दों में नहीं बंधता।
आज मैं 33 वर्ष का हो गया हूँ,
पर बचपन से लेकर आज तक
मुझे याद नहीं पड़ता कि
नाना जी ने कभी मुझे डाँटा हो।
बच्चे को डाँटना तो आम बात है,
और 3‑4 साल से 30‑31 साल तक
किसी भी उम्र में यही होता है।
पर नाना जी ने कभी ऐसा नहीं किया।
यहाँ तक कि कभी ऊँची आवाज़ में भी
मुझसे बात नहीं की।
उन्होंने हमेशा समझाया,
सिखाया—
किसी का बुरा मत करना,
किसी के बारे में गलत मत बोलना।
उनकी हर सीख में
शांति और सच्चाई होती थी।
नाना जी,
आपसे मैंने जो सीखा है,
आपने जो भी मुझे सिखाया है—
वो संस्कार मैं जीवन भर याद रखूँगा।
न किसी से लड़ाई,
न झगड़ा,
न बैर।
जो हमारे बारे में गलत सोचते हैं,
जो हमारा भला नहीं चाहते—
उनकी बातों को नज़रअंदाज़ करना
और अपने कर्म और अपने रास्ते पर ध्यान देना।
आप कहा करते थे—
“जिसकी सोच जितनी होती है,
वो उतना ही सोच पाता है।”
बाकी सब व्यर्थ का शोर है।
इन बातों को मैं सिर्फ़ याद नहीं रखूँगा,
बल्कि अपनी ज़िंदगी में उतारने की पूरी कोशिश करूँगा।
आज मेरे बारे में कोई जो चाहे सोचे,
मुझे उससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
मुझे पता है मैं कैसा हूँ,
मुझे पता है मैं कहाँ खड़ा हूँ,
और मुझे यह भी पता है
कि मुझे अपने जीवन में क्या करना है।
कोई मेरे प्रति कितनी भी घृणा रखे,
कितना भी द्वेष पाले,
मेरे लिए कितना भी भला‑बुरा कह ले,
या कितनी भी चुगली‑चकारी कर ले—
न मुझे फर्क पड़ता है,
न कभी पड़ेगा।
क्योंकि यह भी मैंने
अपने नाना जी से ही सीखा है
कि हर इंसान
उतना ही सोचता है,
उतना ही करता है,
जितनी उसकी समझ होती है।
मैं शोर पर नहीं,
अपने कर्म पर ध्यान देता हूँ।
लोग क्या कहते हैं,
इससे ज़्यादा ज़रूरी यह है
कि मैं अपने भीतर क्या हूँ।
और यही वो सोच है
जो मेरे नाना जी ने
मेरे भीतर बोई थी—
शांत रहो, सच्चे रहो,
और अपने रास्ते पर चलते रहो।
आज आप अपना समय पूरा कर
शांत होकर इस संसार से विदा हो गए।
अब वहाँ जाना अच्छा नहीं लगता—
इसलिए नहीं कि सब कुछ बदल गया है,
बल्कि इसलिए कि
वहाँ अब आप नहीं हैं।
घर वही है,
लोग वही हैं,
लेकिन घर की आत्मा चली गई है।
नाना जी,
आप भले ही शरीर से हमारे साथ न हों,
लेकिन आपकी सीख,
आपके दिए संस्कार
और आपका साया
हर कदम पर मेरे साथ रहेगा।
आप गए नहीं हैं—
आप मेरे भीतर,
मेरी सोच और मेरे कर्मों में
हमेशा जीवित रहेंगे।
मेरे जीवन का सार,
मेरे जीवन की दिशा—
सब कुछ उन्हीं की देन है। 🙏💔

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