मैं बचपन से ही ज़्यादातर समय माँ‑पापा के पास नहीं, अपने नाना जी के पास रहा। पता नहीं ऐसा क्या था उनमें, कि वो ही मुझे सबसे ज़्यादा अपने लगे। कभी‑कभी सोचता हूँ— क्या हमारे बीच सिर्फ़ इस जन्म का रिश्ता था, या कोई बहुत पुराना, शायद पौराणिक सा संबंध था, जो शब्दों में नहीं बंधता। आज मैं 33 वर्ष का हो गया हूँ, पर बचपन से लेकर आज तक मुझे याद नहीं पड़ता कि नाना जी ने कभी मुझे डाँटा हो। बच्चे को डाँटना तो आम बात है, और 3‑4 साल से 30‑31 साल तक किसी भी उम्र में यही होता है। पर नाना जी ने कभी ऐसा नहीं किया। यहाँ तक कि कभी ऊँची आवाज़ में भी मुझसे बात नहीं की। उन्होंने हमेशा समझाया, सिखाया— किसी का बुरा मत करना, किसी के बारे में गलत मत बोलना। उनकी हर सीख में शांति और सच्चाई होती थी। नाना जी, आपसे मैंने जो सीखा है, आपने जो भी मुझे सिखाया है— वो संस्कार मैं जीवन भर याद रखूँगा। न किसी से लड़ाई, न झगड़ा, न बैर। जो हमारे बारे में गलत सोचते हैं, जो हमारा भला नहीं चाहते— उनकी बातों को नज़रअंदाज़ करना और अपने कर्म और अपने रास्ते पर ध्यान देना। आप कहा करते थे— “जिसकी सोच जितनी होती है, वो उतना ही...
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