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एक ऐसा शांत व्यक्तित्व नाना जी का

मेरे नाना जी एक ऐसे शांत व्यक्तित्व थे, जिनके जीवन में न कभी लड़ाई थी, न झगड़ा, न द्वेष। उनके लिए कोई पराया नहीं था— हर इंसान अपना था। हर किसी से उनका व्यवहार सरल, सच्चा और आदर से भरा होता था। हर जगह, हर परिस्थिति में सबका भला चाहने वाली सोच ही उनकी पहचान थी। न उन्होंने कभी किसी की चुगली की, न किसी की निंदा। न ही किसी के कान भरकर किसी के प्रति मन में ज़हर बोया। आज सोचता हूँ— ऐसा इंसान बनना कितना कठिन होता है, जो पूरी ज़िंदगी दूसरों के लिए जी जाए, पर अपने लिए कभी कुछ न माँगे। मेरे नाना जी सिर्फ़ रिश्ते में नाना नहीं थे— वो मेरे दोस्त थे, मेरे गुरु थे। जब मैं सिर्फ़ दो साल का था, तभी से मैं उनके पास रहने लगा। उन्हीं की उँगली पकड़कर चलना सीखा, उन्हीं की छाया में बड़ा हुआ। शायद इसी कारण मेरा सबसे गहरा लगाव सिर्फ़ उन्हीं से था, किसी और से नहीं। नाना जी, आपसे मैंने जो सीखा है, आपने जो भी मुझे सिखाया है— वो संस्कार मैं जीवन भर याद रखूँगा। न किसी से लड़ाई, न झगड़ा, न बैर। जो हमारे बारे में गलत सोचते हैं, जो हमारा भला नहीं चाहते— उनकी बातों को नज़रअंदाज़ कर अपने कर्म और अपने रास्ते ...

पता नहीं ऐसा क्या था

मैं बचपन से ही ज़्यादातर समय माँ‑पापा के पास नहीं, अपने नाना जी के पास रहा। पता नहीं ऐसा क्या था उनमें, कि वो ही मुझे सबसे ज़्यादा अपने लगे। कभी‑कभी सोचता हूँ— क्या हमारे बीच सिर्फ़ इस जन्म का रिश्ता था, या कोई बहुत पुराना, शायद पौराणिक सा संबंध था, जो शब्दों में नहीं बंधता। आज मैं 33 वर्ष का हो गया हूँ, पर बचपन से लेकर आज तक मुझे याद नहीं पड़ता कि नाना जी ने कभी मुझे डाँटा हो। बच्चे को डाँटना तो आम बात है, और 3‑4 साल से 30‑31 साल तक किसी भी उम्र में यही होता है। पर नाना जी ने कभी ऐसा नहीं किया। यहाँ तक कि कभी ऊँची आवाज़ में भी मुझसे बात नहीं की। उन्होंने हमेशा समझाया, सिखाया— किसी का बुरा मत करना, किसी के बारे में गलत मत बोलना। उनकी हर सीख में शांति और सच्चाई होती थी। नाना जी, आपसे मैंने जो सीखा है, आपने जो भी मुझे सिखाया है— वो संस्कार मैं जीवन भर याद रखूँगा। न किसी से लड़ाई, न झगड़ा, न बैर। जो हमारे बारे में गलत सोचते हैं, जो हमारा भला नहीं चाहते— उनकी बातों को नज़रअंदाज़ करना और अपने कर्म और अपने रास्ते पर ध्यान देना। आप कहा करते थे— “जिसकी सोच जितनी होती है, वो उतना ही...

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